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शिक्षा की दुकानदारी बनाम मासूम बचपन : कब तक टूटते रहेंगे सपने?

गाजीपुर : शिक्षा के मंदिरों में नौनिहालों के सपने रोज़ कुचले जा रहे हैं। किताबों से प्यार करने वाले नन्हे मन जब प्रवेश परीक्षा में असफल होते हैं, तो केवल अंक नहीं गिरते—उनका आत्मविश्वास भी चूर-चूर हो जाता है। मासूम आँखों में बसने वाले अरमान बिखर जाते हैं, और उनके मन पर नालायक का ठप्पा लग जाता है।

माधव कृष्ण, द प्रेसीडियम इंटरनेशनल स्कूल, अष्टभुजी कॉलोनी, बड़ी बाग, लंका, गाजीपुर ने शिक्षा व्यवस्था के इस क्रूर चेहरे पर करारा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि शिक्षक का धर्म बच्चों को शिक्षित करना है, न कि उन्हें प्रवेश परीक्षा में असफल बताकर नकार देना। यह कैसा अन्याय है कि एक बच्चा जो ज्ञान के पथ पर कदम रखने को उत्सुक है, उसे दरवाजे पर ही हरा दिया जाता है।

माधव कृष्ण का मानना है कि कम अंक लाना कमजोरी का परिचायक नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि बच्चे को सहारे और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता है। अभिभावकों से उन्होंने मार्मिक अपील की है कि बच्चे के अध्ययन के समय पूरा घर पढ़ाई के वातावरण में ढल जाए। फेंक दीजिए वह मोबाइल, बंद कर दीजिए वह टीवी—क्योंकि जब बच्चा पढ़ने बैठता है, तो पूरे परिवार का समर्पण उसकी ताकत बनता है।

विद्यालयों के व्यावसायिक स्वरूप पर निशाना साधते हुए माधव कृष्ण ने कहा कि बच्चों को कम अंक पाने पर टीसी थमाना शर्मनाक है। यह विद्यालयों के कर्तव्य का परित्याग है। अगर स्कूल सिर्फ अच्छे अंकों वाले बच्चों को ही रखना चाहता है, तो उसे विद्यालय के बजाय व्यापारिक प्रतिष्ठान घोषित कर देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर बच्चों की मार्कशीट दिखाकर उनका प्रदर्शन करना बंद कीजिए। इसके बजाय मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखाइए—वह चेहरा जो सीखने की ललक और जिज्ञासा से भरा हुआ है। क्योंकि अंततः, बच्चों का हंसना और खुश रहना ही असली जीत है।

माधव कृष्ण का यह मर्मस्पर्शी संदेश शिक्षा के उस संवेदनशील पहलू को उजागर करता है, जिसे आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया ने नज़रअंदाज़ कर दिया है। क्या हम मासूमियत और बचपन को व्यापारिक दौड़ में कुचलते रहेंगे या बच्चों को सीखने और खिलने का अवसर देंगे? समाज को अब इस पर गंभीरता से सोचना होगा।

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