भ्रष्टाचार के शिकंजे में एक शिक्षिका का सपना : डॉ. तृप्ति सिंह की अदम्य संघर्ष गाथा

गोरखपुर विश्वविद्यालय की पवित्र भूमि पर एक शिक्षिका का सपना पलता है—डॉ. तृप्ति सिंह। खेल और शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अद्वितीय उपलब्धियों से पहचान बनाने वाली इस जुझारू शिक्षिका का जीवन संघर्षों से घिरा हुआ है।
सपनों का सफर और वादों का छलावा
असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति के समय तृप्ति सिंह को यह भरोसा दिलाया गया कि तीन साल बाद उनकी नियुक्ति को स्थायी कर दिया जाएगा। पर यह वादा मात्र छलावा बनकर रह गया। उनके पति सतपाल सिंह बताते हैं कि कुलपति राजेश सिंह ने स्थायी नियुक्ति के बदले घूस की मांग की।
खेल मैदान में मेहनत, भ्रष्टाचार का सामना
नैक टीम के आगमन से पहले डॉ. तृप्ति सिंह ने दिन-रात मेहनत कर खेल के मैदानों को संवारने का काम किया। वर्षों से उपेक्षित ट्रैक को पुनर्जीवित किया और विश्वविद्यालय को एक नई ऊर्जा से भर दिया। नैक टीम ने उनके प्रयासों को सराहा, लेकिन कर्तव्यनिष्ठा के बदले उन्हें अन्याय और शोषण का सामना करना पड़ा।
वेतन रोकने का षड्यंत्र और महंगे सूट की मांग
नौ महीनों तक वेतन रोक कर कुलपति ने महंगे इटालियन सूट की मांग की। जब तृप्ति ने न्याय के लिए आवाज उठाई, तो उन्हें विश्वविद्यालय के चक्कर लगाने पर मजबूर कर दिया गया। अंततः उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय में नई शुरुआत की, लेकिन यहाँ भी हालात जस के तस रहे।
भ्रष्टाचार की हदें पार, न्याय की अनसुनी पुकार
लखनऊ विश्वविद्यालय में भी विभागाध्यक्ष डॉ. रूपेश कुमार ने न केवल अन्याय किया, बल्कि बिना किसी आधार के उन्हें विश्वविद्यालय से बाहर कर दिया। इसके अलावा, उनके नाम पर 2 लाख रुपये की आवासीय रिकवरी थोप दी गई, जबकि उन्हें कभी आवास आवंटित ही नहीं हुआ था।
न्याय की उम्मीद और रिश्वत की मांग
स्पोर्ट्स कॉलेज प्राचार्य की परीक्षा में शामिल होने के लिए भी उन्हें भ्रष्टाचार का सामना करना पड़ा। इंटरव्यू पत्र को दबाकर 25, 35 और 45 लाख की रिश्वत की मांग की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान पर सवाल उठता है कि जब एक शिक्षिका के साथ ऐसा हो सकता है, तो आम बेटियों का क्या हाल होगा?
लड़ाई जारी है, सपनों को हार नहीं मानने देंगे
डॉ. तृप्ति सिंह आज भी न्याय के लिए संघर्षरत हैं। एक खिलाड़ी हार नहीं मानता, और न ही वह पीछे हटती हैं। मगर सत्ता के गलियारों में उनकी आवाज दबाई जा रही है। उनके पति सतपाल सिंह न्याय के लिए दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन उनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं।
क्या हम बेटियों के सपनों के हक में खड़े होंगे?
यह कहानी सिर्फ डॉ. तृप्ति सिंह की नहीं है, बल्कि हर उस बेटी की है जो अपने सपनों को पूरा करना चाहती है। यह हमारे समाज के सामने एक गंभीर प्रश्न है—क्या हम बेटियों के हक के लिए आवाज उठाएंगे? क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण करेंगे जहाँ उनकी मेहनत का सम्मान हो?
सभार – विनय मौर्या के फेसबुक वाल से।